Spiritual

धर्म क्या है : Dharm Ka Arth Kya Hai, परिभाषा एवं उद्देश्य

नमस्कार बंधुओं आज हमने इस लेख में धर्म क्या है, dharm ka arth kya hota hai, धर्म का उद्देश्य क्या है, और धर्म के अन्य पहलुओं पर चर्चा की है। 

लोगों के बीच धर्म की व्याख्या को लेकर भ्रांति है, समाज में विभिन्न प्रकार के लोग धर्म की विभिन्न परिभाषाएं देते है, लेकिन वास्तव में बहुत कम व्यक्ति ऐसे है जिन्हें धर्म का सही अर्थ पता है। सरकारी नौकरशाही हो या राजनेता हो धर्म की मूल परिभाषा एवं इसका उद्देश्य नगण्य लोगों को ही पता होता है। बिना शास्त्र अध्ययन के धर्म की व्याख्या नहीं की जा सकती है। 

 

शास्त्र कहता है जहाँ धर्म है वहीं विजय हैः धर्म की जड़ें प्राचीन भारत की देन है, भारतीय शास्त्रों का मूल सिद्धांत धर्म पर आधारित है, धार्मिक शिक्षा प्रचार व इसकी रक्षा का उत्तरदायित्व ऋषि मुनियों, साधु संतों, विद्वानों, राजाओं एवं समाज के अन्य विशिष्ट लोगों पर होता है। धर्म समाज एवं राष्ट्र को सही दिशा देने का कार्य करता है, यह लोगों को सत्य एवं असत्य के बीच भेद करना सिखाता है, ताकि बच्चे, युवा एवं बूढ़े अपने मार्ग से कभी न भटके।

 

धर्म स्वयं सत्य का नाम है

धर्म अध्यात्म विज्ञान से निकला हुआ शब्द है, जिसका अर्थ होता है कि जगत में जो कोई वस्तु, मार्ग, कर्तव्य एवं अन्य उत्तरदायित्व धारण करने के योग्य है वही धर्म है; संसार में धारण करने योग्य मात्र सत्य का मार्ग है, इसलिए स्वयं सत्य ही धर्म है। सत्य का अर्थ होता है जो सिद्धान्त शाश्वत है, सदा से है और सदैव रहेगा; जिसे मिटाया न जा सके। सत्य के विपरीत जो कुछ है वह अधर्म की श्रेणी में आ जाता है। विद्वान व्यक्ति धर्म की व्याख्या परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न प्रकार से करते है, परंतु उनके मूल उद्देश्य में केवल सत्य मार्ग का पालन करना होता है, धर्म सही पथ पर चलते हुए जीवन निर्वाह करना है, यह परिवार एवं समाज के लोगों के बीच अच्छे संस्कार उत्पन्न करता है, फलस्वरूप व्यक्ति बुरे विचारों से सदैव दूर रहता है और शांति का अनुभव करता है। धार्मिक लोग अपने पथ से कभी भटकते नहीं है, जीवन में भयानक कष्ट आने पर भी वे सत्य मार्ग का पालन करते रहते है, और समाज में अपना सच्चा आदर्श स्थापित करते है।

 

कर्तव्यों का पूर्णत पालन करना धर्म हैं

धर्म का एक बड़ा लक्ष्य है कि, व्यक्ति सही-गलत में भेद करना सीख ले; अपने परिवार के प्रति, समाज व राष्ट्र के प्रति सभी उत्तरदायित्व को पहचाने, साथ ही सत्य मार्ग पर चलता हुआ अपने सभी कर्तव्यों को मन से पूर्ण करने की चेष्टा करता रहें। उदाहरण

  • माता पिता का धर्म अपने बच्चों का अच्छा चरित्र निर्माण करना एवं सदैव उनका मार्गदर्शन करते रहना।
  • गुरुजनों का कर्तव्य है कि सभी छात्रों को बिना भेदभाव के उचित शिक्षा प्रदान करना।
  • बच्चों का कर्तव्य है की सदैव माता-पिता, शिक्षक, अतिथि, बड़े बुजुर्गों का सम्मान करना और उनकी सभी सही बातों को अपने जीवन में ग्रहण करना।

ध्यान रहे कि कर्तव्य पालन का अर्थ भ्रष्ट और गलत मार्ग पर चलना नहीं होता है, अपितु जो कार्य मानव मात्र, प्रकृति एवं अन्य जीवों के बीच में बाधा पहुंचाता है वह कार्य गलत श्रेणी में आता है, ऐसे कार्य से सभी व्यक्तियों को बचना चाहिए।

 

समाज व राष्ट्र की रक्षा करना धर्म है

धर्म का अर्थ है की सभी प्रकार के बुरे लोगों एवं बुराइयों से समाज व राष्ट्र के लोगों की रक्षा करना, धर्म लोगों में आत्मविश्वास को सुदृढ़ करता है, यह व्यक्ति को श्रेष्ठ मार्ग पर चलना सिखाता है और जब व्यक्ति उच्च गुणों से भर जाता है तो वह समाज में उपजी हुई बुराइयों के दमन के प्रति उजागर हो जाता है। मात्र एक धार्मिक व्यक्ति ही समाज को जीवन के उच्चतम मूल्यों के विषय में समझा सकता है। जब राष्ट्र में धर्म का नाश होने लगता है तो भ्रष्टाचार, चोरी, लूटपाट, मारपीट आदि अवगुण समाज के उच्चतम शिखर पर विराजमान हो जाते है; इसलिए इस प्रकार की बुराइयों को नष्ट करने का कर्तव्य सभी धार्मिक व्यक्तियों का होता है।

 

सत्य की स्थापना करना

सत्य सूर्य के समान मानव जाति को ज्ञान का प्रकाश देने वाला होता है किन्तु, जब कभी भी सत्य की हानि होती है तो, धर्म का नाश होता है। समाज के अन्दर दुष्ट व्यक्तियों की उपस्थिति हमेशा बनी रहती है, ये व्यक्ति अपने नकारात्मक विचार एवं कार्यों से समाज में अस्थिरता पैदा करते रहते है, जिस कारण लोगों के बीच लालच, झूठ, बेईमानी का जन्म होता है। 

कुकृत्य करने वाले लोगों के कारण ही लोग सत्य के मार्ग से विचलित हो जाते है, क्योंकि जब देश के लोग लालची एवं स्वार्थी होकर मानव कल्याण के विषय में विचार करना बंद कर दे तो उस राष्ट्र का पतन निश्चित ही हो जाता है। इसलिए सभी विद्वान लोगों का धर्म होता कि वह सत्य की हानि नहीं होने दे, चाहे उसके लिए उन्हे कोई भी मूल्य चुकाना पड़े; जो व्यक्ति सत्य की रक्षा करने में सदैव तत्पर रहते है उन लोगों की ख्याति देश-विदेश तक जाति है, ऐसे लोग समाज में उच्च स्तर का सम्मान व प्रतिष्ठा प्राप्त करते है। इसलिए सत्य की स्थापना में सभी व्यक्तियों को सदैव प्रयास करते रहना चाहिए, ताकि लोगों को पथभ्रष्ट होने से बचाया जा सके और एक श्रेष्ट समाज का निर्माण किया जा सके।

 

प्रकृति का संरक्षण करना धर्म है

भारत देश में प्रकृति को माता का स्थान दिया गया है, प्रकृति सभी आवश्यक वस्तुओं की जननी है; वास्तव में सभी जीवों का भरण पोषण प्रकृति के द्वारा ही किया जाता है। अगर प्रकृति न हो तो जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। इसलिए धर्म कहता है कि प्रकृति एवं इसके संसाधनों की सदैव रक्षा करना सभी मनुष्यों का कर्तव्य है। मनुष्य अपने जीवन यापन के लिए अन्न, जल, भोजन, वायु, ईंधन, खनिज, आदि सभी पदार्थ सतत रूप से प्राकृतिक संसाधनों से लेता रहता है, इसलिए सभी मनुष्यों का धर्म है कि वह इन सभी प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी करता रहे ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इन संसाधनों का भरपूर लाभ प्राप्त कर सके। 

 

परंतु, वर्तमान में मनुष्य उसका उल्टा ही कर रहा है, वह सभी प्राकृतिक संसाधनो का सीमा से अधिक उपभोग करता जा रहा है, किन्तु उसके संरक्षण के लिए कुछ विशेष उपाय नहीं कर रहा है। इसलिए पृथ्वी पर संतुलित जीवन जीने का वातावरण खराब व निम्न कोटि का होता जा रहा है। प्रदूषित हवा, जल अथवा ग्लोबल वार्मिंग प्रकृति के साथ नकारात्मक छेड करने के ही परिणाम है।

 

सभी लोगो को शिक्षित करना

धर्म का एक अन्य अर्थ सभी मनुष्यों के भीतर उच्च स्तर के आदर्श स्थापित करना है, ताकि जीवन के संघर्षों से कोई व्यक्ति हताश न हो और गलत मार्ग से सदैव दूर रहे, परंतु ये आदर्श केवल अच्छी शिक्षा से ही प्राप्त किये जा सकता है। यहाँ शिक्षा का अर्थ कॉलेज डिग्री शिक्षा से नहीं है, अपितु शिक्षा का अर्थ जीवन के मूल्यों को समझ कर शांति से जीवन यापन करना है। शिक्षा धर्म के केंद्र में विराजमान है; शिक्षा के बिना धर्म की व्याख्या नहीं की जा सकती है, धर्म जीवन जीने की एक कला है और शिक्षा का उद्देश्य श्रेष्ठ संस्कारों को व्यक्ति की आत्मा में स्थापित करना है। सच्ची शिक्षा समाज को सही दिशा एवं दशा प्रदान करती है, जिस राष्ट्र में शिक्षा को सर्वोत्तम समझा जाता हो, उस राष्ट्र के लोग धन संपदा से परिपूर्ण बने रहते है, वहाँ भ्रष्टाचार जैसे बुराइयों का अंत हो जाता है और समाज के लोग निर्भीक होकर जीवन व्यतीत करते है, इसलिए सभी लोगो को सही शिक्षा प्रदान करना धर्म का प्रथम लक्ष्य है।

 

धर्म संतुलित जीवन जीने की कला हैं

संसार में लगभग सभी मनुष्य असभ्य ही पैदा होते है, बहुत कम पुण्य आत्मा ऐसी होती है जो अपने पूर्व जन्मों के अच्छे संस्कार के कारण विद्वान के रूप में जन्म लेती है। सही संस्कार के अभाव में मनुष्य सदैव अशांत अनुभव करता है, धन भी अशांत व्यक्ति को शांति प्रदान नहीं कर सकता है। इसलिए एक धार्मिक व्यक्ति ही परमआनंद की स्थिति को प्राप्त करने में सक्षम होता है, क्योंकि मात्र धर्म ही मनुष्य जाति में अच्छे संस्कार पैदा कर सकता है, सही  संस्कार से ही अच्छे विचार पैदा होते है; जिससे मनुष्य का उचित चरित्र निर्माण होता है। एक अधार्मिक व्यक्ति के भीतर अच्छे विचारों की हमेशा कमी रहती है, अधार्मिक व्यक्ति कितना भी दिखावा कर ले, सुख सुविधाएं खरीद ले, परंतु बिना धार्मिक शिक्षा के वह संतुलित जीवन नहीं प्राप्त कर सकता है।  

सुख, शांति, एवं संतुष्टि का मार्ग धर्म से होकर जाता है; धार्मिक लोग कम धन अर्जन कर के भी संतुलित जीवन निर्वाह करते है. क्योंकि धर्म मनुष्य को अध्यात्म विज्ञान की ओर ले जाता है, यह व्यक्ति को परमानंद मार्ग प्रदान करने का सर्वश्रेष्ठ मार्ग है जिस पर चलकर सभी मनुष्य संसारिक माया के बोझ से मुक्त होते जाते है।

यह भी पढ़े-

रोज योग करने के फायदे

ध्यान करने के फायदे

Leave a Comment

Your email address will not be published.

You may also like