Spiritual

ईश्वर-भगवान का अर्थ, कौन, क्या, कैसा है साकार या निराकार

Ishwar Bhagwan Ka Arth, Kya, Kon, Kaisa Hai

आज हमने से लेख में ईश्वर, भगवान कौन है, क्या है, कैसा, उसका स्वरूप व आकार कैसा है इन सब विषयों पर अच्छे से संक्षेप में चर्चा की है। 

ईश्वर वह तत्व है जो सर्वश्रेष्ठ है व वंदना करने योग्य है, सभी पदार्थों का स्वामी है एवं उसका स्थान देवताओं से भी ऊँचा है। ईश्वर ब्रहृाड़ के सभी कारणों का कारण है, किन्तु ईश्वर का कारण कोई नहीं है। सर्वगुणों से सम्पन्न होने के कारण वह देवा का देव महादेव भजनीय(पूजने योग्य) है, इसलिए उसे भगवान कहते है। वह ब्रह्म सर्व शक्तिशाली है, सर्वव्यापक होने से सर्वज्ञानी, उसका कोई आकार व परिमाप नहीं है इसलिए निराकार है, जन्म-मृत्यु से परे है। 

क्योंकि, ईश्वर जगत के बाहर भीतर प्रत्येक जगह विराजमान है इसलिए वह सर्वव्यापक कहलाता है। यह संपूर्ण सृष्टि व ब्रहृाड उस विधाता के भीतर ही समाया है। वेदों के अनुसार ईश्वर नेत्र व इन्द्रियों का विषय नहीं है. इसलिए उसे आँखों से नहीं देखा जा सकता है। वह न्यायकारी ईश्वर परम ऐश्वर्या का स्वामी(इंद्र) होने, सभी देवताओं का भी देवता है. वह 16 कलाओं से पूर्ण होने के कारण षोडशी कहलाता है। संसार की समस्त वस्तुओं व पदार्थों का स्वामी है. अग्राह्यम, अगोत्रम, अवर्णम, अकल्पम व, दयालु है। 

ईश्वर जब संसार की रचना करता है तो उसे ब्रह्म करते है, सभी पदार्थों में चराचर होने से एवं जगत का पालन पोषण करने से वह विष्णु कहलाता है। मंगलकारी होने से शिव कहलता है, और दुष्टों का रुलाने व दमन करने के कारण रूद्र कहलाता है।

संसार में केवल ईश्वर ही उपासना के योग्य है और कोई नहीं 

संसार में ईश्वर सर्वोच्च है, ऋग्वेद 4.26.2 के अनुसार वह सर्वशक्तिशाली, सर्वगुण संपन्न ईश्वर ही उपासना के योग्य है।

क्योंकि उसी परमेश्वर की कृपा से यह भूमि सब धर्म जनों को प्रदान की गई है, ताकि मनुष्य पृथ्वी का सुख व समृद्धि पाये, वायु के द्वार सभी जीवों के जीवन को प्रेरणा देने वाला वही है, उसी का उपदेश ग्रहण कर लोग विद्वान हो जाते है. इसलिए मनुष्यों को केवल उस ईश्वर की ही उपासना करनी चाहिए।

अ॒हं भूमि॑मददा॒मार्या॑या॒हं वृ॒ष्टिं दा॒शुषे॒ मर्त्या॑य ।

अ॒हम॒पो अ॑नयं वावशा॒ना मम॑ दे॒वासो॒ अनु॒ केत॑मायन् ॥ (ऋग्वेद- 4.26.2)

ईश्वर अविनाशी है

ईश्वर जन्म मृत्यु के बंधन से परे है, संसार में जो कोई जन्म लेता है उसकी मृत्यु भी अवश्य होती है; जन्म मृत्यु की माया से केवल जीव(आत्मा) बंधा हुआ है, ईश्वर नहीं। वह परमेश्वर तो अजन्मा है, सर्वशक्तिशील एवं पूर्ण सामर्थ्यवान; सर्वव्यापी व सर्वज्ञानी होने के कारण उसे जन्म मृत्यु के बंधन की आवश्यकता नहीं। 

वह ईश्वर किसी का दास नहीं है। इस ब्रह्मांड में जो कुछ पैदा होता है अथवा निर्माण किया जाता है वह एक दिन अवश्य नष्ट हो जाता है। सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, शरीर, खाद्य पदार्थ, वस्त्र, वस्तुएँ आदि सब अपने-अपने समय आने पर नष्ट होते जाते है, किन्तु वह अनश्वर परमात्मा प्रत्येक दशा व स्थिति में एक जैसा ही बना रहता है। सरल शब्दों में कहे तो नाश उन पदार्थो को होता है जो किसी के द्वारा बनायी जाती है, परंतु ईश्वर तो अनादि अनंत है उसे बनाने वाले कोई नहीं है, अपितु वही सबका निर्माण करने वाला है, इसलिए ईश्वर अविनाशी है।

ईश्वर सर्वव्यापी है

यह बात जान लेना अत्यंत आवश्यक है कि ईश्वर प्रत्येक स्थान व  दिशा में व्याप्त है; ब्रह्मांड  के बाहर एवं भीतर ऐसी कोई जगह नहीं जहाँ ईश्वर विराजमान न हो। जीव के हृदय में वह परमेश्वर ब्रह्मपुरी स्थान पर विचरता है, वास्तव में यह सम्पूर्ण सृष्टि ईश्वर के भीतर ही समाई हुई है, इसलिए भगवान भौतिक व अभौतिक सभी वस्तुओं में समान रूप से व्याप्त है। उदाहरण के लिए इसे ऐसे समझे- जैसे आकाश(खाली स्थान) तत्व एक घडे के भीतर भी स्थित होता है, एवं बाहर भी। उसी प्रकार वह ब्रह्मा जगत के बारह भी है व अन्दर भी।

ईश्वर सर्वज्ञाता है

क्योंकि परमपिता परमेश्वर कण-कण से लेकर प्रत्येक जगह उपस्थित है, इसलिए सर्वव्यापी होने से सर्वज्ञाता(सब कुछ जानने वाला) है। सर्वज्ञाता वह होता है जो ब्रह्मांड में समस्त भूतकाल, वर्तमान एवं भविष्य की प्रत्येक जानकारी रखता हो, उस सर्वशक्तिशाली परमेश्वर के समान कोई अन्य सर्वज्ञाता नहीं है। यहाँ यह बात जान लेना अत्यंत आवश्यक है कि ईश्वर प्रत्येक जगह विराजमान है इसलिए वह सर्वज्ञानी है, अगर सर्वव्याप्त नहीं होता तो सर्वज्ञाता न हो सकता था।

काल का भी काल महाकाल है

जब सृष्टि में प्रलय काल के समय सब कुछ नष्ट हो जाता है और समय का अस्तित्व भी समाप्त हो जाता है तब भी ईश्वर अपने संपूर्ण रूप में बना रहता है। वास्तव में स्वयं ईश्वर ही सभी काल का निर्माण और नष्ट करने वाला होता है, इसलिए उसे महाकाल कहा जाता है। ईश्वर अपने इक्ष्ण(इच्छा) द्वारा इस सृष्टि की प्रकृति पदार्थ का उपयोग करते हुए रचना करते है और समय आने पर उसे नष्ट भी करते है।

ईश्वर न्यायकारी है

मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है, वह जो चाहे जैसा चाहे कर्म कर सकता है. परंतु कर्म का फल मनुष्य के अधीन नहीं। कर्मफल प्रदान करने का अधिकार ईश्वर को है। मनुष्य द्वारा अपने जीवन काल में किये गये अच्छे-बुरे कर्म के आधार पर ईश्वर न्याय प्रदान करते है. उस परमेश्वर के न्याय में रत्ती भर की त्रुटि नहीं है, वह सच्चा न्याय करने वाला है।

मनुष्य के कर्म उसका भविष्य निर्माण करते है. हम जैसा कर्म(कार्य) करते है उसी के अनुसार हमें उसका फल(परिणाम) प्राप्त होता है। जीव को कर्म के कुछ फल वर्तमान में मिल जाते है, और कुछ अगले जन्मों में। इसलिए शास्त्र सदैव अच्छे कर्म करने की शिक्षा पर जोर देता है, क्योंकि अच्छे कार्यों के अच्छे परिणाम एवं बुरे कार्यों के बुरे परिणाम होते है। 

हालांकि मनुष्य अपने कार्य करने में स्वतंत्र है इसलिए सत्य असत्य, लाभ-हानि, अच्छा-बुरा इनमें से अपने लिए जो विकल्प चुनना चाहे चुन सकता है। व्यक्ति के कर्म ही उसके चरित्र व आचरण का निर्माण करते, जिससे समाज में उस व्यक्ति की पहचान उजागर होती है। कर्मफल का सिद्धांत इस बात से समझा जा सकता है कि विद्वान लोगों की सब प्रशंसा व अनुसरण करते है, वही दुष्ट व्यक्ति की सब आलोचना करते है।

ईश्वर निराकार है अथवा साकार

ईश्वर निराकार है

निराकार का अर्थ है जिसका कोई आकार न हो. ईश्वर का कोई आकार नहीं है, इसलिए उसका कोई रंग रूप भी नहीं है। वेद व उपनिषद में स्पष्ट कहा गया है कि ईश्वर आँख व अन्य इन्द्रियों का विषय नहीं है। यजुर्वेद- अध्याय:32 मन्त्र3 कहता है “न तस्य॑ प्रति॒माऽअस्ति॒” अर्थात उस परमेश्वर की कोई प्रतिमा अथवा आकृति नहीं होती है

आकार उस वस्तु का होता है जिसकी लम्बाई, चौड़ाई, मोटाई होती है, या जो वस्तु एक निश्चित स्थान में समायी हुई हो; आकार व परिमाप उसका होता है जिसकी सीमाएं होती है. और जिसका कोई बनाने वाला हो।

परंतु ईश्वर तो अनंत है(न उसका आदि है और न अंत), जिसकी कोई सीमाएं ही नहीं उसका आकार कहा से होगा। और अधिक सरल शब्दों में कहे तो आकार पदार्थ व उससे निर्मित वस्तुओं का होता है. ईश्वर पदार्थ नहीं है. बल्कि सभी पदार्थों का निर्माण ईश्वर द्वारा प्रकृति तत्व का प्रयोग करके किया जाता है। भला जिसका कोई आकार ही नहीं उसे आंखों द्वारा कैसे देखा जा सकता है। 

अंगिरा ऋषि मुण्डकोपनिषद् में इस कथन के अनुसार उस निराकार ईश्वर का अर्थ कहते है।

यत्तदृश्यमग्राह्ममगोत्रमवर्णमचक्षुः श्रोत्रं तदपाणिपादम्।

नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः।। (प्रथम खंड- मुण्डकोपनिषद्)

अर्थ- जो न देखा जा सके और न पकड़ा जा सके, जिसका कोई गोत्र  व वर्ण नहीं है। जिसको आंख-कान आदि इन्द्रियों की जरूरत नहीं. जिसे हाथ पांव की आवश्यकता नहीं और वह सर्वत्र व्यापक है एवं अत्यंत सूक्ष्म है। उस क्षय रहित नित्य व्यापक और उस जगत के निमित्त कारण को धीर पुरूष सर्वत्र देखते है।

अब सरल उदाहरण से समझने की कोशिश करें।

उदाहरण के लिए मनुष्य को भूख लगती है, परंतु भूख को आँखों द्वारा नहीं देख सकते है, फिर भी भूख का अस्तित्व तो रहता ही है। अन्य उदाहरण- वायु वायुमंडल में सदैव उपस्थित रहती है, परंतु आँखे उसे देख नहीं सकती है, इससे वायु का अस्तित्व तो नहीं मिट जाता। कहने का तात्पर्य है कि जो आँख व अन्य इन्द्रियों का विषय नहीं है उसे आंख कैसे देख सकती है। इन्द्रियों की एक निश्चित सीमाएं होती है, उस सीमा के परे व कार्य नहीं करती है।

अगर ईश्वर को साकार मान भी ले और कहे कि ईश्वर ने स्वयं ही अपने आप को बनाया तब भी ईश्वर का मूल रूप तो निराकार ही रहा। आकार वाले व्यक्ति व वस्तुएं एक निश्चित स्थान घेरती है, अगर ईश्वर का आकार होता तो वह एक निश्चित परिमाप सीमा में विराजमान होता, तब ऐसा ईश्वर सर्वव्यापी न रहता और सर्वव्यापी न होने से सर्वज्ञानी भी न रह पाता। ऐसे ईश्वर में विकार उत्पन्न हो जाता और व सर्वगुण संपन्न भी नहीं होता ।

ईश्वर सर्वगुण सम्पन्न है

उस भगवान में कोई दुर्गुण नहीं है, न ही कोई बुराई विद्यमान है. वह ईश्वर सभी गुणों से परिपूर्ण है। उस परमात्मा में किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं है जो उसे अन्य जीव जैसा बनाता हो। दुर्गुण केवल मनुष्य व अन्य जीवों में होते है, जीवों मे अवगुण स्वभावतः होते  अतः जीव कभी सर्वगुण वाला नहीं हो सकता है। ईश्वर तो सभी अच्छाई से भरा हुआ है, उसके समक्ष कोई दूसरा नहीं है. इसलिए वह सर्वगुण सम्पन्न कहलाता है

ईश्वर पूर्णतः सामर्थ्यवान है

समस्त संसार व जगत में ऐसा कोई भी कार्य नहीं जो ईश्वर न कर सके, सारा ब्रह्मांड उस विधाता में ही समाहित है. वह ईश्वर तो सभी पदार्थों एवं जीवो में विद्यमान है, और सब कुछ करने में समर्थ भी है। उसे कहीं जाने की आवश्यकता नहीं क्योंकि वह तो पहले से ही प्रत्येक जगह विराजमान है। वह परमपिता ब्रह्मा अपने सामर्थ्य से ब्रहृाड़ की सभी सृष्टियों की स्थापना व नाश करता है, उसके सामर्थ्य में किसी चीज की न ता कोई त्रुटि होती है न कोई अभाव। इसलिए वह पूर्ण सामर्थ्यवान कहलाता है।

ईश्वर एक है अथवा अनेक?

ईश्वर के विभिन्न नाम है, किन्तु ईश्वर अनेक नहीं, एक ही है। गुणों के आधार पर ईश्वर के अनेक नाम है- ब्रह्मा, विष्णु, शिव, रूद्र, इंद्र, अग्नि, परमात्मा, परमेश्वर, भगवान, ॐ, प्रजापति आदि।  

क्या ईश्वर व आत्मा दोनों एक ही तत्व है?

नहीं, ईश्वर व आत्मा दोनों विभिन्न तत्व है. आत्मा ईश्वर के अधीन होता है। जबकि ईश्वर स्वतंत्र और संपूर्ण है व सभी चीजों का निमित्त कारण है।

क्या मोक्ष स्थिति में आत्मा ईश्वर में विलीन हो जाता है?

नहीं, ईश्वर, आत्मा व प्रकृति तीनो अनादि तत्व है,  इनका जन्म मरण नहीं होता है। मोक्ष की स्थिति में आत्मा ईश्वर के सानिध्य में रहकर परमानंद को प्राप्त करता है। अगर आत्मा , ईश्वर में विलीन होकर एक हो जाये तो मोक्ष का सुख कौन भोगेगा।

प्रकृति क्या  होती है?

प्रकृति ईश्वर व जीव की तरह ही अनादि है, यह जड़ तत्व है परंतु इसमें गति परमेश्वर के कारण ही होती है. प्रकृति सत्व, रज और तमो तीन गुणों से मिलकर बनी हुई है, यह जगत का उपादान कारण है, और ईश्वर के नियंत्रण में रहती है। परमपिता ब्रह्मा जब सृष्टि का निर्माण करते है तो प्रकृति तत्व से ही सभी वस्तुओं- सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी, लोक, आदि का निर्माण करते है।

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