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शिक्षा का उद्देश्य क्या है

shiksha ka uddeshya kya hai

शिक्षा का उद्देश्य क्या है ( shiksha ka uddeshya kya hai )

 

अगर शिक्षा की सबसे सरल परिभाषा देने को कहाँ जाए तो वह परिभाषा क्या हो सकती है। यहाँ शिक्षा की भिन्न-भिन्न तरह की परिभाषाएँ दी जा सकती हैं, परंतु परिभाषा ऐसी होनी चाहिए कि आम नागरिकों की समझ मे आ जाये। कई बार संक्षेप में परिभाषाएँ लिखने पर उनके अर्थ समझना आसान नही हो पाता। अतः, परिभाषा सीधे और सरल शब्दों में होनी चाहिए।

वैसे शिक्षा का उद्देश्य केवल और केवल मनुष्य के सर्वांगीण विकास करना हैं। अर्थात उसकी सोच के दायरे को विकसित करना हैं। सभी मनुष्य अशिक्षित और असभ्य ही पैदा होते हैं। उन्हे धीरे-धीरे समय के साथ शिक्षित बनाया जाता हैं। कोई भी मनुष्य एक बार में ही शिक्षित नही हो जाता हैं। इस प्रक्रिया में एक लंबा समय लगता हैं।

उदाहरण के तौर पर जैसे हम किसी वृक्ष को उगाने के लिए एक बीज को मिट्टी में बोते है एवं उसके लिए पर्याप्त धूप, जल, तथा अन्य खिनजो की व्यवस्था करते हैं। धीरे-धीरे बीज से अंकुर निकलता हैं, उसके बाद उसका पौधा बनता हैं और एक लम्बे समय के बाद वह पौधा वृक्ष का रूप धारण करता हैं। उसी प्रकार मनुष्य को भी शिक्षित व सभ्य होने में एक समय प्रक्रिया से गुजरना पड़ता हैं।

 

शिक्षा का अर्थ एवं उद्देश्य (shiksha ka arth kya hai)

सही मायने में शिक्षा का अर्थ एवं उद्देश्य समझने में हमें जीवन की कई परिस्थितियों से गुजरना पड़ता हैं। जीवन में हमें विभिन्न ऐसी कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता हैं, जो हमे एक सीख दे कर जाती हैं। और जीवन के ये क्षण अनुभव का कार्य करते हैं। जो आगे चलकर नई पीढ़ी के लिए मार्गदर्शन का कार्य करते हैं। जीवन के अनुभवों से सीखना भी एक प्रकार से शिक्षा ही हैं। 

दूसरे शब्दों में कहे तो शिक्षा का लक्ष्य मनुष्यों को गलत राह पर जाने से रोकना और सही राह दिखाना हैं। क्योंकि जब तक हमें सही व गलत का ज्ञान नहीं होगा, तब तक हम सार्थक जीवन नहीं जी सकते हैं। ज्ञान, अज्ञान में भेद करना ही शिक्षा का उद्देश्य हैं। 

कोई भी गलत कार्य शिक्षा नहीं हो सकता, वो अक्षिशा ही कहलाएगा। शिक्षा वही है जो सही कार्य अथवा सही विचार हैं।

शिक्षा का अर्थ केवल स्कूल या कॉलेज जाना मात्र नहीं हैं। हमारी प्रथम शिक्षा हमारे घर से आरम्भ होती हैं। हमारे माता-पिता, भाई-बहन, आदि घर के अन्य सदस्यों से ही हमें जीवन की प्रारंभिक शिक्षा लेना का अवसर मिलता हैं। उसके पश्चात हमें बाहरी दुनिया अर्थात समाजिक दुनियाँ में आना पड़ता हैं। भारतीय संस्कृति में माता को पहला गुरू कहा गया हैं। केवल और केवल माता ही एक ऐसा गुरू रूप है जो अपनी संतान के लिए सब कुछ त्याग कर सकती हैं। माता ही संतान को चलने-फिरने लायक, बोलने लायक, आचार-विचार लायक बनाती हैं। तत्पश्चात बालक व बालिकाए सामाजिक जीवन प्रारम्भिक अवस्थ में उतरने लायक हो जाते हैं।

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रोजगार में शिक्षा का महत्व

 बहुत से लोगो को लगता है कि शिक्षा का अर्थ केवल एक अच्छा रोज़गार पा लेना मात्र हैं। परंतु ऐसा कतई नहीं हैं। एक अच्छा रोज़गार मिलना ही केवल शिक्षा का उद्देश्य नहीं, इसके अलावा भी कई ऐसे बिंदु हैं जैसे- उच्च मानसिक स्तर का विकास, समाज में अच्छे बुरे के बीच फर्क समझना, लाभ हानि का ज्ञान होना, परिवार व समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को समझना व उनका निर्वाह करना, देश हित का विचार विकसित होना, वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखना ताकि लोगो को एक अच्छा जीवन दिया जा सके, इसके अलावा प्रकृति संम्बधी विचार जैसे पर्यावरण की रक्षा, जल संरक्षण, शुद्ध वायु, जंगलों का संरक्षण एवं विभिन्न प्राकृतिक सम्पदाओ को बनाए रखने के लिए प्रगतिशील होना आदि बहुत सारे महत्वपूर्ण कार्य शिक्षा के उद्देश्य हैं।

अच्छी शिक्षा ग्रहण करके कैसे समाज की बुराईयों को खत्म किया जाये, रोज़गार के अवसर कैसे उत्पन्न किए जाये, भ्रष्टाचार पर कैसे लगाम लगे, स्वच्छता व स्वास्थ कैसे अच्छे किए जाये, लोगो के अन्दर देश-प्रेम व एकता कैसे उत्पन्न किया जाये आदि विषय अच्छी शिक्षा पद्धति के अंतर्गत ही आते हैं

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